लूट ले।

ये करम अज्ञान के, फल जिन्हें भोगना पड़ा,
कष्ट में जो हैं खड़े, तू साथ उनके हो खड़ा।
बोझ उनका कर दे हल्का, हाथ अपना थामकर,
मांगते जो वस्तु हैं वो, दे उन्हें तू दान कर।
तन से, मन से, धन से, या फिर हो दुआओं का असर,
जिस तरह संभव हो तुमसे, कर मदद की तू डगर। जिस तरह संभव हो तुमसे, कर मदद तू बेफिकर।
हम यहाँ “लुटाने” आए, दान ही बस धर्म है,
लूट ले कोई हमें, तो इसमें क्या शर्म है?
शोक इसका क्यों करें कि लुट गए हम राह में,
लुटाने ही तो आए थे, हम ईश की पनाह में।
लुटाने ही तो आए थे, हम शिव की पनाह में।

Adi Suyash