
आदि सुयश: क्योंकि उसके मस्तिष्क में श्रेणियाँ (categories) निर्धारित हैं—कि इसका आनंद लेना चाहिए और इसका नहीं; यह अच्छा है और यह बुरा है। यदि उन श्रेणियों को हटा दो, तो परिग्रह (possessiveness) अपने आप समाप्त हो जाएगा। है या नहीं?
और बस हर चीज़ का आनंद लो। उसे अपना मानो भी नहीं, तब भी उसका आनंद लो। तो सबसे पहले न तो परिग्राही बनना है और न ही श्रेणियाँ रखनी हैं। एक से मुक्त हो जाओगे, तो दूसरा भी समाप्त हो जाएगा। यदि परिग्रह हटा दो, तो श्रेणियाँ भी मिट जाएँगी; और यदि श्रेणियाँ समाप्त कर दो, तो परिग्रह भी समाप्त हो जाएगा।
फिर देखो कैसे हर चीज़ का आनंद लेते हो। पूछना नहीं पड़ेगा कि इसका आनंद कैसे लें। ठीक है? बच्चों को नहीं बताना पड़ता कि किसी चीज़ का आनंद कैसे लें। बड़ों को दो गुड़िया दे देंगे, तो वे पूछेंगे कि इसका आनंद कैसे लेना है। बच्चों को देखो।
जिज्ञासु 1: वे तो गुड्डा-गुड़िया की कहानियाँ ही बना लेंगे।
जिज्ञासु 2: मतलब बड़ों को आनंद लेने के लिए कोई तर्क या बहाना चाहिए।
आदि सुयश: बच्चों को यदि वह ‘हॉट व्हील्स’ वाली कार दे दो, तो वे उसे ज़मीन पर चला-चलाकर मज़े लेंगे। बड़ों को दे दो, तो वे पूछेंगे—इसका क्या करना है? उन्हें पता ही नहीं है कि क्या करना है और कैसे इसका आनंद लेना है। वे खोज रहे हैं कि इसमें आनंद कहाँ है? इसमें क्या सुख है? बच्चे आनंद ले रहे हैं, बड़े नहीं। ऐसा क्यों?
जिज्ञासु 1: बच्चे तो कोरे कागज़ से भी आनंद ले लेंगे।
जिज्ञासु 2: (आवाज़ निकालते हुए) ‘त्शू…’ कागज़ का विमान बनाकर उड़ा देंगे।
आदि सुयश: इसका उत्तर ही नहीं दिया जा सकता कि इसमें क्या मज़ा है। जब आप खेल रहे होते हो, जैसे बचपन में मैं खेल रहा था… एक समय आता है जब आप प्रतिदिन शाम चार बजे मैदान में खेलने जाते थे। फिर एक दिन कोई लड़का बोलता है—”इसमें क्या मज़ा है?” बस, तब समझ लो कि आप ‘बड़े’ हो गए। समझ लो कि अब वह बचपना, वह innocence समाप्त हो गया। जब आपको पूछना पड़ रहा है कि इसमें क्या मज़ा है या इसमें आनंद कैसे लें, तो समझ लो कि कुछ तो गलत हो गया है। अन्यथा, हर दिन बस कुछ न कुछ करने में मज़ा आ रहा था, और अचानक एक दिन आपको पूछना पड़ रहा है कि इसमें क्या मज़ा है।
जिज्ञासु 1: वह रोज़ क्रिकेट खेल रहा था, उसे अच्छा लग रहा था।
आदि सुयश: हाँ, और अचानक एक दिन लगा—”अब इसमें क्या रखा है, क्या ही मज़ा है इसमें?”
जिज्ञासु 2: यह मेरे भाई के साथ हुआ था।
आदि सुयश: ध्यान से देखो, तो खेल में क्या मज़ा रखा है? कुछ भी तो नहीं। बल्ले से गेंद को मारने में क्या मज़ा है? मैं आपसे पूछ रहा हूँ—इसे कैसे ‘इन्जॉय’ करेंगे? वही तो आप अभी मुझसे पूछ रहे थे कि “कैसे आनंद लें?” मुझे तो यह समझ नहीं आता कि “कैसे आनंद न लें?” और कुछ है ही कहाँ? जो कुछ भी है, वह आनंद ही तो है। हम स्वयं आनंद से ही तो बने हैं। आनंद क्यों न लें? हम हर चीज़ का आनंद लेंगे। क्यों न लें, यह बताओ? मातम क्यों मनाएँ? आनंदित क्यों न रहें? वैसे भी, जो कार्य करना है, वह तो करना ही था।
तब आपके पास दो विकल्प हैं—हँसकर करो या रोकर। तो तुम उसे रोकर क्यों कर रहे हो? मुझे यह बताओ।
जिज्ञासु 1: वही बात है, सिखाना यही है। बस यही।

